Japan की पहली महिला प्रधानमंत्री के बावजूद शाही सिंहासन पर महिलाओं की रोक, 2600 साल पुराने राजवंश पर उत्तराधिकार का गहराता संकट


Japan ने हाल ही में सानाए ताकाइची के रूप में अपनी पहली महिला प्रधानमंत्री का स्वागत कर इतिहास रचा, लेकिन इसी देश के लगभग 2600 वर्ष पुराने शाही राजवंश में आज भी किसी महिला को सम्राट बनने की अनुमति नहीं है। यही विरोधाभास अब जापान की राजनीति, समाज और शाही व्यवस्था के केंद्र में बड़ी बहस बनता जा रहा है।

एक ओर देश का लोकतांत्रिक नेतृत्व पहली बार किसी महिला के हाथों में पहुंचा है, वहीं दूसरी ओर दुनिया के सबसे पुराने निरंतर चले आ रहे राजवंश में उत्तराधिकार का संकट लगातार गहराता जा रहा है। वर्तमान कानून के अनुसार केवल पुरुष उत्तराधिकारी ही सम्राट बन सकता है, जबकि शाही परिवार में योग्य पुरुष सदस्यों की संख्या लगातार घटती जा रही है।


सिर्फ चार पुरुष उत्तराधिकारी, शाही परिवार के भविष्य पर बढ़ी चिंता

जापान के मौजूदा शाही परिवार में अब केवल चार पुरुष सदस्य ही ऐसे हैं जो उत्तराधिकार की वर्तमान व्यवस्था में शामिल माने जाते हैं।

इनमें वर्तमान सम्राट नारुहितो (66 वर्ष), उनके छोटे भाई प्रिंस आकिशिनो (60 वर्ष), सम्राट के चाचा प्रिंस हिताची (90 वर्ष) तथा आकिशिनो के 19 वर्षीय पुत्र प्रिंस हिसाहितो शामिल हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार हिसाहितो पिछले लगभग 40 वर्षों में शाही परिवार के पहले ऐसे पुरुष सदस्य हैं जो वयस्कता की ओर पहुंचे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पुरुष उत्तराधिकारियों की संख्या कितनी सीमित हो चुकी है।

राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भविष्य में उत्तराधिकार की वर्तमान व्यवस्था में बदलाव नहीं किया गया तो आने वाले दशकों में जापानी शाही परिवार के सामने गंभीर संवैधानिक और संस्थागत चुनौती खड़ी हो सकती है।


प्रिंसेस आइको को जनता का समर्थन, लेकिन कानून बना सबसे बड़ी बाधा

सम्राट नारुहितो की इकलौती संतान 24 वर्षीय प्रिंसेस आइको हैं। हाल के जनमत सर्वेक्षणों में बड़ी संख्या में जापानी नागरिकों ने इच्छा जताई है कि भविष्य में आइको को जापान की साम्राज्ञी (Empress) बनने का अवसर मिलना चाहिए।

हालांकि वर्तमान इंपीरियल हाउस लॉ (Imperial House Law) के तहत ऐसा संभव नहीं है।

1889 में लागू किए गए इस कानून के अनुसार केवल पुरुष उत्तराधिकारी ही शाही सिंहासन पर बैठ सकता है। इतना ही नहीं, यदि कोई राजकुमारी किसी सामान्य नागरिक से विवाह करती है तो उसे शाही परिवार की सदस्यता भी छोड़नी पड़ती है।

यही कारण है कि शाही परिवार का आकार लगातार छोटा होता जा रहा है और उत्तराधिकार का संकट गहराता जा रहा है।


पहली महिला प्रधानमंत्री और शाही परंपरा का विरोधाभास

जापान में सानाए ताकाइची का प्रधानमंत्री बनना महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।

लेकिन यही देश आज भी अपनी सबसे पुरानी संस्था—शाही राजवंश—में महिलाओं को सर्वोच्च पद देने के लिए तैयार नहीं दिखता।

विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था और पारंपरिक राजशाही के नियमों के बीच यही सबसे बड़ा विरोधाभास बनकर उभर रहा है।

जहां आधुनिक जापानी समाज महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को स्वीकार कर रहा है, वहीं शाही उत्तराधिकार के नियम अब भी लगभग डेढ़ शताब्दी पुराने प्रावधानों पर आधारित हैं।


सरकार ने उत्तराधिकार संकट से निपटने के लिए पेश किया नया प्रस्ताव

उत्तराधिकार संकट को देखते हुए ताकाइची सरकार ने संसद में एक नया विधेयक प्रस्तुत किया है।

इस प्रस्ताव के अनुसार, 1947 में शाही परिवार से अलग किए गए राजवंश की शाखाओं के अविवाहित पुरुष सदस्यों को गोद लेकर उन्हें पुनः उत्तराधिकार व्यवस्था में शामिल किया जा सकता है।

सरकार का तर्क है कि इससे भविष्य में उत्तराधिकारियों की संख्या बढ़ेगी और राजवंश की निरंतरता बनी रहेगी।

हालांकि इस प्रस्ताव में प्रिंसेस आइको अथवा भविष्य में उनके बच्चों को उत्तराधिकार का अधिकार देने का कोई प्रावधान शामिल नहीं किया गया है। यही कारण है कि इस प्रस्ताव पर भी व्यापक बहस जारी है।


रूढ़िवादी वर्ग कानून में बदलाव के खिलाफ

जापान का एक प्रभावशाली रूढ़िवादी वर्ग वर्तमान उत्तराधिकार कानून का समर्थन करता है।

इनका मानना है कि शाही परिवार की परंपरा पुरुष उत्तराधिकारियों के माध्यम से ही आगे बढ़नी चाहिए और इसमें परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए।

दूसरी ओर, सुधारवादी विचारधारा के समर्थक तर्क देते हैं कि आधुनिक समाज में लैंगिक समानता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए महिलाओं को भी शाही उत्तराधिकार का अधिकार मिलना चाहिए।

यही वैचारिक मतभेद आज जापानी राजनीति और समाज में व्यापक बहस का विषय बना हुआ है।


इतिहास में आठ महिला सम्राट रह चुकी हैं

शाही वंशावली के विशेषज्ञ और चुओ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माकोटो ओकावा का कहना है कि महिलाओं को उत्तराधिकार से बाहर रखना कोई प्राचीन परंपरा नहीं है।

उनके अनुसार, 592 से 1771 के बीच जापान में आठ महिला सम्राट शासन कर चुकी हैं।

इसलिए महिलाओं के शासन का इतिहास जापान में पहले से मौजूद रहा है। प्रोफेसर ओकावा का कहना है कि 1889 के बाद बने कानूनी ढांचे ने इस परंपरा को समाप्त कर दिया।

उनका मत है कि यदि महिलाओं को उत्तराधिकार से बाहर रखा जाता रहा तो भविष्य में शाही परिवार की स्थिरता बनाए रखना कठिन होगा।


1889 का कानून कैसे बना विवाद की जड़

1889 में लागू किए गए इंपीरियल हाउस लॉ ने उत्तराधिकार व्यवस्था को केवल पुरुष वंश तक सीमित कर दिया।

इस कानून के बाद महिलाओं के सम्राट बनने की परंपरा समाप्त हो गई।

इसके अतिरिक्त, विवाह के बाद राजकुमारियों का शाही परिवार से बाहर हो जाना भी राजपरिवार के आकार को लगातार छोटा करता गया।

आज यही प्रावधान उत्तराधिकार संकट की सबसे बड़ी वजहों में गिना जा रहा है।


1947 के संविधान संशोधन का असर आज भी दिखाई दे रहा है

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1947 में जापान के संविधान और शाही व्यवस्था में बड़े बदलाव किए गए।

इसी दौरान 11 शाही शाखाओं को राजपरिवार से अलग कर दिया गया और उनके सदस्यों को सामान्य नागरिक का दर्जा दे दिया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि उस समय लिए गए इस निर्णय का प्रभाव आज भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि उत्तराधिकारियों का दायरा काफी सीमित हो चुका है।

इसी पृष्ठभूमि में वर्तमान सरकार अब उन्हीं पूर्व शाही शाखाओं के कुछ पुरुष सदस्यों को वापस उत्तराधिकार व्यवस्था में शामिल करने का विकल्प तलाश रही है।


क्या भविष्य में बदल सकता है कानून?

हाल के वर्षों में जापान में महिलाओं को उत्तराधिकार का अधिकार देने की मांग समय-समय पर उठती रही है।

जनमत सर्वेक्षणों में बड़ी संख्या में नागरिक प्रिंसेस आइको को भविष्य की साम्राज्ञी के रूप में देखने की इच्छा जता चुके हैं, लेकिन कानून में बदलाव के लिए राजनीतिक सहमति अभी भी चुनौती बनी हुई है।

यदि भविष्य में संसद उत्तराधिकार कानून में संशोधन करती है तो जापान के शाही इतिहास में एक बड़ा परिवर्तन संभव हो सकता है। वहीं यदि मौजूदा व्यवस्था जारी रहती है, तो सीमित पुरुष उत्तराधिकारियों के कारण शाही परिवार के भविष्य को लेकर बहस और तेज होने की संभावना बनी रहेगी।


 

जापान में पहली महिला प्रधानमंत्री का उदय लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का प्रतीक माना जा रहा है, लेकिन शाही राजवंश की उत्तराधिकार व्यवस्था अब भी पुरुष उत्तराधिकारियों तक सीमित है। सीमित उत्तराधिकारियों, बदलते सामाजिक दृष्टिकोण और प्रिंसेस आइको को मिल रहे जनसमर्थन के बीच यह विषय आने वाले वर्षों में जापान की संवैधानिक, राजनीतिक और सामाजिक बहस का महत्वपूर्ण केंद्र बना रह सकता है। हालांकि उत्तराधिकार से जुड़े किसी भी संभावित बदलाव का निर्णय अंततः जापान की संसद और लागू कानूनी व्यवस्था के माध्यम से ही होगा।



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