बेंगलुरु में पूर्व हॉकी कप्तान M.M. Somaiya के घर चोरी, 1980 मॉस्को ओलंपिक का गोल्ड मेडल भी ले गए चोर


बेंगलुरु में चोरों ने भारतीय हॉकी के पूर्व दिग्गज खिलाड़ी M.M. Somaiya के घर को निशाना बनाते हुए 1980 मॉस्को ओलंपिक का गोल्ड मेडल चोरी कर लिया। इसके अलावा चोर उनके दो अन्य एशियाई खेलों के पदक और चैंपियंस ट्रॉफी का पदक भी ले गए। चोरी की वारदात 28 अक्टूबर की रात हुई, जब 67 वर्षीय सोमैया अपने परिवार के साथ कर्नाटक के कोडागु गए हुए थे।

चोरों ने घर से सोने के गहने, चांदी के सामान और करीब 30 हजार रुपये नकद भी चोरी किए। पुलिस ने चोरी हुए सामान की कुल कीमत लगभग 3.53 लाख रुपये आंकी है। चोरी हुए पदकों में 1980 ओलंपिक का स्वर्ण पदक सबसे महत्वपूर्ण है, जिसे भारतीय हॉकी के इतिहास की एक यादगार उपलब्धि माना जाता है।

पड़ोसी ने दी चोरी की सूचना, सीसीटीवी में दिखे दो संदिग्ध

घटना का पता उस समय चला, जब एक पड़ोसी ने सोमैया के घर का दरवाजा खुला देखा। संदेह होने पर उसने तुरंत सोमैया को इसकी जानकारी दी। इसके बाद चोरी की सूचना पुलिस को दी गई।

पड़ोसी के घर में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज में रात करीब 2 बजकर 34 मिनट पर दो संदिग्ध व्यक्तियों को सोमैया के घर में प्रवेश करते देखा गया। फुटेज के अनुसार, एक संदिग्ध ने नीली और दूसरे ने लाल रंग की शर्ट पहन रखी थी। पुलिस सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपियों की पहचान करने और चोरी की घटना की जांच में जुटी है।

चोरी हुए पदकों में ओलंपिक गोल्ड के साथ एशियन गेम्स के मेडल भी शामिल

चोर अपने साथ एम.एम. सोमैया के खेल करियर से जुड़े कई महत्वपूर्ण पदक ले गए। इनमें 1980 मॉस्को ओलंपिक का स्वर्ण पदक, 1982 एशियन गेम्स का रजत पदक, 1986 एशियन गेम्स का कांस्य पदक और 1982 चैंपियंस ट्रॉफी का कांस्य पदक शामिल हैं।

इन पदकों का महत्व केवल उनकी आर्थिक कीमत तक सीमित नहीं है। ये भारतीय हॉकी के अंतरराष्ट्रीय सफर और सोमैया की वर्षों की खेल उपलब्धियों की यादगार निशानियां हैं। खासतौर पर 1980 मॉस्को ओलंपिक का स्वर्ण पदक भारतीय हॉकी के इतिहास के एक महत्वपूर्ण दौर से जुड़ा हुआ है।

1980 में 16 साल बाद भारत ने फिर जीता था ओलंपिक गोल्ड

मॉस्को ओलंपिक 1980 में भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने फाइनल मुकाबले में स्पेन को 4-3 से हराकर स्वर्ण पदक जीता था। यह जीत इसलिए भी खास थी, क्योंकि भारत ने इससे पहले 1964 के टोक्यो ओलंपिक में हॉकी का स्वर्ण पदक हासिल किया था। इस तरह 16 साल के अंतराल के बाद भारतीय टीम एक बार फिर ओलंपिक चैंपियन बनी थी।

इससे पहले भारतीय हॉकी टीम ने 1928 से 1956 तक लगातार छह ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर विश्व हॉकी में अपनी मजबूत पहचान बनाई थी। मॉस्को में मिली जीत ने भारतीय हॉकी की उस गौरवशाली परंपरा को एक बार फिर याद दिलाया। फाइनल में सुरिंदर सिंह सोढ़ी ने दो गोल किए, जबकि मोहम्मद शाहिद और एम.के. कौशिक ने एक-एक गोल करके भारत की जीत में अहम भूमिका निभाई।

इंटरनेशनल डेब्यू के साथ ही ओलंपिक चैंपियन बने थे सोमैया

एम.एम. सोमैया का पूरा नाम मानेयापांडा मुथन्ना सोमैया है। उनका जन्म 8 मई 1959 को कर्नाटक के मर्कारा, जिसे अब मदिकेरी के नाम से जाना जाता है, में हुआ था। उनके पिता बॉम्बे हॉकी एसोसिएशन से जुड़े थे। सोमैया को बचपन से ही हॉकी में रुचि थी। वह पांच साल की उम्र से हॉकी देखते थे और 12 साल की उम्र में उन्होंने खेलना शुरू कर दिया था।

बाद में माइकल सालदान्हा ने उन्हें महिंद्रा एंड महिंद्रा की टीम में खेलने का अवसर दिया। वर्ष 1975 से वह बॉम्बे की जूनियर और सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप टीमों का हिस्सा बनने लगे। वर्ष 1980 में मॉस्को ओलंपिक के दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय हॉकी में पदार्पण किया और अपने पहले ही बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भारतीय टीम के साथ ओलंपिक स्वर्ण पदक जीत लिया।

एस्ट्रो टर्फ की चुनौती से निपटने के लिए बजरी के मैदान पर किया अभ्यास

1980 मॉस्को ओलंपिक भारतीय हॉकी टीम के लिए एक नई चुनौती भी लेकर आया था। उस समय अंतरराष्ट्रीय हॉकी में एस्ट्रो टर्फ का इस्तेमाल बढ़ रहा था। यह कृत्रिम घास से तैयार की गई सतह होती है, जिस पर गेंद प्राकृतिक घास के मुकाबले अधिक तेजी से चलती है। भारतीय खिलाड़ी तब तक मुख्य रूप से प्राकृतिक घास के मैदानों पर खेलने के अभ्यस्त थे।

इस बदलाव के लिए भारतीय टीम के कोच बालकृष्ण सिंह ने बेंगलुरु में बजरी के मैदान पर खिलाड़ियों से अभ्यास कराया था। इसका उद्देश्य खिलाड़ियों को तेज सतह पर गेंद की गति और खेल की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करना था। सोमैया ने भी बाद में बताया था कि एस्ट्रो टर्फ पर खेलना उनके लिए एक नया अनुभव था।

तीन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व, 1988 में संभाली कप्तानी

मॉस्को ओलंपिक के बाद एम.एम. सोमैया ने 1984 के लॉस एंजिलिस और 1988 के सियोल ओलंपिक में भी भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 1988 में उन्हें भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में दो हॉकी विश्व कप, दो एशियन गेम्स, दो एशिया कप और तीन चैंपियंस ट्रॉफी टूर्नामेंट में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। खेल में उनके योगदान के लिए उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

हॉकी से संन्यास लेने के बाद सोमैया ने भारत पेट्रोलियम के स्पोर्ट्स विभाग में भी काम किया। उनके घर से पदकों की चोरी की घटना ने उनके खेल जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों से जुड़ी यादगार वस्तुओं की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। पुलिस सीसीटीवी फुटेज के आधार पर संदिग्धों की तलाश कर रही है।

1980 मॉस्को ओलंपिक का स्वर्ण पदक भारतीय हॉकी के गौरवशाली इतिहास की एक अनमोल निशानी है। एम.एम. सोमैया के घर से इस पदक की चोरी केवल एक संपत्ति की चोरी नहीं, बल्कि उनके दशकों के खेल सफर और देश के लिए हासिल की गई उपलब्धियों से जुड़ी यादों का नुकसान भी है।



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